1764 में बक्सर का युद्ध हुआ जिसमें East India Company और बंगाल, अवध और मुगल साम्राज्य के गठबंधन के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें East India Company ने सिराजुद्दौला, मीर कासिम और शाह आलम द्वितीय की संगठित सेना को मुंहतोड़ तरीके रुन दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि East India Company ने हिंदुस्तान की केंद्रीय सत्ता को उखाड़ फेंका और अंग्रेजी हुकूमत स्थापित की गई।
अंग्रेजों को भारत से पैसे कमाकर विदेश में भेजना था इसलिए उन्होंने भारत में लगान वसूलना चालू किया। भारत में सबसे ज्यादा खेती होती थी इसलिए अंग्रेजों ने किसानों पर ज्यादा से ज्यादा लगान लगाया। अंग्रेजों ने किसानों की पैदावार पर 60% लगान वसूलना चालू किया। लगान इतना ज्यादा था कि किसान समय पर लगान नहीं दे पाते थे। महीने दर महीने लगान बढ़ता रहता, फिर एक वक्त ऐसा आता कि किसान के पास पैसे ही नहीं होते थे, तब अंग्रेज उनका खेत जब्त कर लेते। अब अंग्रेजों के पास बहुत सारी जमीन हो गई थी। अंग्रेजों को तो पैसों से मतलब था, लेकिन सिर्फ जमीन रखने से पैसा थोड़ी मिलेगा, इसलिए उन्होंने जमींदारी का नियम लागू किया। अंग्रेजों ने पूर्वोत्तर भारत में जैसे बिहार, बंगाल और कुछ उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में जमींदारी का नियम लागू किया।
इस नियम से अंग्रेज जमीन जब्त करते थे लेकिन पैसे नहीं कमा पाते थे, इसलिए उन्होंने साहूकारों को जमींदार बना दिया। अब ये जमींदार जो किसान लगान नहीं दे पाते थे, उनकी जमीन जप्त करते और उन्हीं की जमीन पर किसानों से खेती करवाते। फिर जो पैदावार होती, उसे बाजार में बेचकर जो पैसे मिलते, उसका 60% अंग्रेजों को दे देते।
अब किसान अपनी ही जमीन पर मजदूरों की तरह काम करते और जमींदार उस जमीन का मालिक बन जाता। अंग्रेजों ने लगान और बढ़ा दिया जिससे जमींदारों ने मजदूरी में कटौती करनी शुरू कर दी। अब किसानों को मजदूरी भी सही से नहीं मिलती थी।
अब जिस-जिस किसान को मजदूरी मंजूर नहीं थी, वे जंगल के किनारे बस जाते और अपना जीवन-यापन करते। जब उन्हें भूख लगती, तब जंगल से फल खा लेते और घर बनाना होता तो जंगल से लकड़ी काट लेते। मतलब जंगल के पास उनकी रोटी, कपड़ा, मकान की सारी जरूरतें पूरी हो जातीं। धीरे-धीरे जिन-जिन किसानों की जमीन को जमींदारों ने कब्जा लिया था, वे सारे किसान जंगल के पास बसने लगे, जिन्हें हम आज आदिवासी बोलते हैं।
अब अंग्रेजों को और पैसों की जरूरत थी और अंग्रेजी सरकार का कमाने का जरिया लगान वसूली था। अंग्रेजों ने सोचा कि जमीन तो उतनी ही है और कर भी सीमित आ रहा है, लेकिन हमारे खर्चे ज्यादा हैं। अगर हमें खर्चे पूरे करने हैं तो जमीन बढ़ानी पड़ेगी और जमीन बढ़ा सकते हैं जंगल काटकर। अंग्रेजों ने फिर एक नियम निकाला जिसका नाम था Forest Act। इस नियम के तहत जितने भी जंगल थे, उस जंगल से कोई भी आदमी लकड़ी, फल या अन्य वस्तु नहीं ले सकता था। सारे जंगलों के मालिक अब अंग्रेजी सरकार बन चुकी थी। अब सारे आदिवासियों की रोजी-रोटी बंद हो चुकी थी। कोई चुपके से जंगल से लकड़ी काटता तो उसे जेल में डाल देते। अब अंग्रेज खुलेआम जंगल के पेड़ों को काटते और उस जमीन को जमींदारों को सौंप देते। जमींदार आदिवासियों से उस खेत पर खेती करवाते और अंग्रेजों को 60% कर दे देते।
अब अंग्रेज सभी राज्यों के जंगलों को काटने लगे। अंग्रेजों ने बिहार के जंगलों को भी काटना शुरू कर दिया था। लेकिन बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों का विरोध करना शुरू कर दिया। उन्होंने लोगों को इकट्ठा किया और लोगों से कहा कि ये अंग्रेज अपनी जेब भरने के लिए हमारे जंगलों को काट रहे हैं। जंगल हमारी माँ के समान है और ये अंग्रेज हमें हमारी माँ से अलग करना चाहते हैं। अब अंग्रेजों को सबक सिखाना होगा। इस भाषण के बाद लोगों ने अंग्रेजों को जंगल में आने से रोकना शुरू कर दिया। जब-जब अंग्रेज जंगल में आते, तब-तब लतिया जाते। अब अंग्रेज भड़क गए। उन्होंने बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया। करीब 2 साल तक वे जेल में रहे, उसके बाद जेल से रिहा हो गए।
जेल से रिहा होने के बाद वे अंडरग्राउंड हो गए और लोगों को इकट्ठा करने लगे। बिरसा मुंडा ने लोगों को बताया कि पहले हमारी सारी जरूरतें जंगल से पूरी हो जाती थीं, जैसे हमें लकड़ी चाहिए तो जंगल से मिल जाती थी, फल चाहिए तो जंगल के पेड़ों से तोड़ लेते थे, पानी चाहिए तो नदी से पी लेते थे। मतलब हमारी सारी जरूरतें जंगल से पूरी हो जाती थीं। हमें किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ती थी। लेकिन अंग्रेजों को ज्यादा से ज्यादा कर चाहिए था और कर तभी ज्यादा मिलेगा जब ज्यादा से ज्यादा खेती होगी। ज्यादा से ज्यादा खेती करने के लिए जंगल काटने पड़ेंगे। इसलिए अंग्रेजों ने Forest Act निकाला ताकि जंगल उनके हाथ में आ जाए और जंगल को जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल कर सकें। अब हमें इन अंग्रेजों का विरोध करना है। अब हमें उलगुलान आंदोलन करना होगा। उन्हें जंगल काटने नहीं देना है। अगर जंगल काटना है तो जंगल के आसपास रहने वाले लोगों से इजाजत लेनी होगी। अगर सबकी इजाजत है तभी जंगल कटेगा, वरना नहीं कटेगा।
इस भाषण के बाद लोगों में भी अंग्रेजों के खिलाफ नफरत की आग जलने लगी थी। लोगों ने आसपास के सारे अंग्रेजों के थाने जला दिए। करीब ८९ थाने और जमींदारों के घर जलाए गए। वहाँ का District Magistrate घबरा गया। उसने राज्य की सुरक्षा के लिए अंग्रेजों से सेना भेजने की मांग की। अब उस जंगल के आसपास कोई भी अंग्रेज नहीं आता था। अंग्रेज बिरसा मुंडा से डरने लगे थे।
अब बिरसा मुंडा अंडरग्राउंड से बाहर आकर भाषण देने लगे। एक दिन डोमबारी पहाड़ी पर वे भाषण देने वाले थे। उलगुलान आंदोलन अपने चरमसीमा पर था। इस आंदोलन को कुचलने के लिए British Commissioner A. Forbes और Deputy Commissioner H.C. Streattfield की अगुवाई में सेना की दो टुकड़ियों को डोमबारी पहाड़ी पर भेजा गया। डोमबारी पहाड़ी के भाषण में और भी कई क्रांतिकारी भाग लेने वाले थे। करीब 5000 लोग उस पहाड़ी पर आए। भाषण शुरू हुआ, तभी पहाड़ के चारों ओर से अंग्रेजी सेना आ गई। उन्होंने सभी लोगों को गोलियों से भून दिया। चंद मिनटों में वह पहाड़ी हरे रंग से लाल रंग में बदल चुकी थी। Statesman अखबार के हिसाब से करीब 400 लोग मारे गए। इस पहाड़ी पर सिर्फ और सिर्फ लाशों के ढेर थे। जो मर गए थे, अंग्रेजों ने उन्हें पहाड़ों से नीचे फेंक दिया और जो बच गए थे उन्हें जिंदा दफना दिया। अंग्रेजों ने आधिकारिक रूप से बताया कि इस गोलीबारी में सिर्फ 11 लोगों की मौत हुई है। कुछ लोग इस गोलीबारी में बच गए, उनमें से बिरसा मुंडा भी थे।
किसी तरह वे वहाँ से बचकर निकल गए और अंडरग्राउंड हो गए। अंग्रेज बहुत परेशान थे। बिरसा मुंडा उन्हें मिल ही नहीं रहे थे, इसलिए अंग्रेजों ने गांव-गांव में घोषणा कर दी कि जो भी बिरसा मुंडा का पता बताएगा उसे अंग्रेजी सरकार ₹500 का इनाम देगी। बिरसा मुंडा जंगल की जमीन के नीचे एक झोपड़ी में रहते थे। तभी उनके ही किसी करीबी आदमी ने अंग्रेजों को उनके ठिकाने का पता बता दिया। अंग्रेज बिरसा मुंडा की तलाश में उस ठिकाने पर पहुंचे। बिरसा मुंडा झोपड़ी में बैठे थे, तभी अंग्रेजों के सुपरिंटेंडेंट रॉस ने अपनी बंदूक की संगीन से दरवाजा खोला। बिरसा मुंडा निहत्थे थे। रॉस ने उन्हें धर दबोचा।
अंग्रेज उन्हें रात के अंधेरे में ही ले गए। अंग्रेजों ने इस बात का पूरा खयाल रखा कि किसी को भी बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी की खबर न मिले, इसलिए वे बिरसा मुंडा को गांव के रास्ते नहीं बल्कि जंगल के रास्ते ले गए। अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को रांची की जेल में कैद कर दिया। तब तक पूरे गांव में बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी की बात फैल चुकी थी। जब उन्हें जेल से अदालत में ले जाया जा रहा था, तब उनके हाथों में जंजीर और पूरे शरीर पर चाबुक के निशान थे। अंग्रेज ये बताना चाहते थे कि कोई भी अंग्रेजों का विरोध करेगा तो उसका यही अंजाम होगा। अदालत से उन्हें solitary confinement जेल में भेजा गया और वहाँ 3 महीने तक उन्हें किसी से मिलने की इजाजत नहीं थी। वहीं उनकी तबीयत खराब हुई। उनके गले में इन्फेक्शन हो गया, खून की उल्टियां होने लगीं और उनकी मृत्यु हो गई। अंग्रेजों ने आधिकारिक रूप से बताया कि बिरसा मुंडा की मौत हैजे से हुई है। लेकिन उनकी मौत कैसे हुई, यह आज भी रहस्य है। कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि उनकी मौत slow poison से हुई है। अंग्रेज उनके खाने में slow poison मिलाकर देते थे।
बिरसा मुंडा की मौत के बाद अंग्रेजों को डर था कि अगर इस मौत की खबर लोगों तक पहुंच गई तो दंगे भड़क सकते हैं, इसलिए अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा की लाश को चुपचाप स्वर्णरेखा नदी के पास जला दिया।
लेकिन बिरसा मुंडा की मौत की खबर लोगों तक पहुंच ही गई। कुछ दिनों में बिरसा मुंडा की मौत की खबर पूरे बिहार में फैल गई थी। लोगों ने बगावत शुरू कर दी और जो बिरसा मुंडा की मांग थी कि अगर जंगल काटना है तो जंगल के आसपास रहने वाले लोगों की सहमति जरूरी है, इस पर धरना-प्रदर्शन होने लगे। करीब 8 साल बाद 1908 में इस नियम को लागू किया गया। Chota Nagpur Tenancy Act के तहत कोई भी जंगल क्षेत्र की जमीन को कोई भी सरकार बिना उन लोगों की इजाजत के किसी भी आदमी को बेच नहीं सकती और बिना उस जंगल के आदिवासियों की इजाजत के जंगल का एक पेड़ भी नहीं काट सकती।
बिरसा मुंडा के समय भले ही लगा हो कि उनका उलगुलान आंदोलन बेकार था, लेकिन अब वह आंदोलन सफल होता दिख रहा है और आज भी यह कानून भारत के संविधान की अनुसूची 6 के तहत लागू है। आज भी राज्य को कोई पावर नहीं है कि बिना जंगल के आसपास रहने वाले लोगों की सहमति के वह जंगल को काट सके, जैसे west बंगाल में कोई भी पेड़ नहीं कट सकता बिना वहां के लोगों की इजाजत के।
जिस दिन बिरसा मुंडा का जन्मदिन है, उसी दिन झारखंड को राज्य का दर्जा दिया गया था। आज बिरसा मुंडा के नाम पर एयरपोर्ट भी बना है। बिरसा मुंडा की तस्वीर भी संसद में लगी है। लेकिन क्या फायदा?
आज भी अनुसूची 6 को लागू करने के लिए जो आदमी लद्दाख में संघर्ष कर रहा था, उसे जेल में रखा गया है। यह एक केस नहीं है, ऐसे और भी हैं। और यह सिर्फ BJP पार्टी है इसलिए हो रहा है, ऐसा नहीं है, बल्कि जब कांग्रेस की सरकार थी तब भी ऐसा ही हुआ था। G.D. अग्रवाल जो गंगा नदी के आसपास कंस्ट्रक्शन को रोकने के लिए संघर्ष कर रहे थे, वे संघर्ष करते-करते शहीद हो गए। उत्तराखंड में जब जंगल काटे जा रहे थे तब लोग पेड़ों से लिपट गए थे, लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज करके उन्हें भी हटा दिया और पेड़ों की कटाई जारी रही।
यह सब हमारी आंखों के सामने हो रहा है और हम देखते रहते हैं, जैसे पहले बिरसा मुंडा को जब गिरफ्तार किया गया था तब भी पूरा देश देख रहा था। बिरसा मुंडा ने आंदोलन अपने लिए नहीं किया था बल्कि हम सबके लिए किया था, देश के हित के लिए किया था। बिरसा मुंडा ने जंगल काटने का विरोध किया था, लेकिन अंग्रेजों ने आम लोगों को बताया कि उनके भाषणों ने लोगों को उकसाया है, जिससे लोगों ने हमारे 89 थाने और जमींदारों के घर जला दिए हैं, इसलिए वे देशविरोधी हैं। और सबने मान लिया। वही चीज आज भी हो रही है।
सोनम वांगचुक ने सिर्फ यही मांग की थी कि लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाए ताकि वे अनुसूची 6 को लागू कर सकें, ताकि वहां जो पेड़ काटे जा रहे हैं, उन्हें रोका जा सके। लेकिन सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया।
सोनम वांगचुक ही नहीं बल्कि उमर खालिद, जी.डी. अग्रवाल और भी अन्य लोग, जिसने-जिसने भी देश के हित की बात बोलने की जरूरत की है, उसे जेल में डाल दिया गया है।
बिरसा मुंडा के समय भी लोग चुपचाप देख रहे थे। आज भी हम चुपचाप देख रहे हैं। यह गुलामी नहीं तो और क्या है? पहले भी अंग्रेज हमें डराकर, मारकर चुप करा देते थे और आज भी ये गोरे अंग्रेज हमें डराकर, मारकर चुप करा रहे हैं।